जब पानी बना साझी विरासत: बालिकुमा की बदलती तस्वीर ओडिशा देश के सबसे अधिक सूखाग्रस्त राज्यों में गिना जाता है। ढेंकानाल जिले का छोटा-सा गांव बालिकुमा इसका एक सशक्त उदाहरण है कि यदि समुदाय, संसाधन और सही पहल एक साथ आ जाएँ, तो जल संकट जैसी गंभीर समस्या का भी स्थायी समाधान संभव है। करीब 120 घरों और लगभग 650 लोगों की आबादी वाले इस गांव में वर्षों तक पानी की भारी किल्लत रही। गांव के लगभग आधे पुरुष रोजगार की तलाश में शहरों या आसपास के जिलों की कोयला खदानों और इस्पात कारखानों में मजदूरी करने चले जाते थे। उनके पीछे गांव में रह जाती थीं महिलाएं, जिनके दिन का बड़ा हिस्सा केवल पानी जुटाने में बीत जाता था। जंगलों की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने के साथ-साथ दूर-दराज़ से पानी ढोना उनकी रोजमर्रा की नियति बन चुका था। इसी चुनौती को अवसर में बदलने का काम किया फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सिक्योरिटी (FES) की जल संरक्षण परियोजना ने। इस पहल ने केवल बालिकुमा ही नहीं, बल्कि ओडिशा के आठ जिलों के 45 ब्लॉकों में स्थित लगभग 1,600 गांवों की तस्वीर बदल दी। आज ये गांव सामुदायिक जल प्रबंधन के प्रेरक मॉडल के रूप में पहचाने जाते हैं। परियोजना के बाद किसानों को दूर जंगलों या अन्य स्रोतों से पानी लाने की कठिन मेहनत से राहत मिली। सिंचाई के लिए नियमित पानी उपलब्ध होने से खेती की उत्पादकता बढ़ी, आय में वृद्धि हुई और पलायन की मजबूरी भी कम होने लगी। बालिकुमा की सबसे बड़ी विशेषता यहां विकसित की गई साझा जल प्रबंधन व्यवस्था है। गांव में पानी को निजी संपत्ति नहीं, बल्कि सामुदायिक संसाधन माना गया। चाहे पानी किसी निजी कुएं में हो, उसका उपयोग पूरे गांव के हित में किया जाता है। हरे रंग की पाइपलाइनें गांव की गलियों और सड़कों से होकर गुजरती हैं, जो कुओं को खेतों और घरों से जोड़ती हैं। जलवायु परिवर्तन और बढ़ते जल संकट के दौर में पानी के साझे उपयोग का यह मॉडल अत्यंत प्रेरणादायक और दूरदर्शी है। पाइपलाइन व्यवस्था लागू होने के बाद खेतों तक नियमित पानी पहुंचने लगा। खेती से होने वाली आय में वृद्धि ने मजदूरी के लिए होने वाले पलायन को कम किया, वहीं महिलाओं को पानी के लिए घंटों संघर्ष करने से भी राहत मिली। अब वे अपना समय परिवार, बच्चों की शिक्षा, आजीविका और सामुदायिक गतिविधियों में लगा पा रही हैं। परियोजना शुरू होने से पहले गांव में केवल एक सामुदायिक कुआं था, जबकि आज यहां 15 कुएं हैं। वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देने के लिए 16 तालाब बनाए गए तथा पुराने जलाशयों और झीलों का पुनर्जीवन किया गया। इन प्रयासों से वर्षा का पानी जमीन में समाने लगा, भूजल स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ और आसपास के जलस्रोत भी पुनर्जीवित हो गए। गांव के सभी निजी कुओं को सामुदायिक उपयोग के लिए खोल दिया गया। अब कोई भी ग्रामीण किसी भी कुएं से पानी ले सकता है। यह बदलाव केवल जल उपलब्धता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने आपसी विश्वास, सहयोग और सामाजिक एकता को भी नई मजबूती दी। एक समय था जब महिलाएं रोज़ कई किलोमीटर पैदल चलकर सिर पर घड़े ढोती थीं और गांव के इकलौते सामुदायिक कुएं या झरने पर अपनी बारी का घंटों इंतजार करती थीं। हर वर्ष मार्च से जून-जुलाई तक अधिकांश कुएं सूख जाते थे। लेकिन वर्षा जल संचयन, तालाब निर्माण और भूजल पुनर्भरण के प्रयासों ने इस स्थिति को पूरी तरह बदल दिया। अब अधिकांश कुओं में सालभर पानी उपलब्ध रहता है। सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन गांव की सामुदायिक सोच में आया है। आज यहां यह भावना मजबूत हुई है कि "पानी सबका है और उसकी जिम्मेदारी भी सबकी है।" लोगों ने महसूस किया कि प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण तभी सफल हो सकता है, जब पूरा समुदाय मिलकर उसकी जिम्मेदारी उठाए। इस परियोजना की सफलता में महिलाओं की भागीदारी निर्णायक रही। उन्हें केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि योजना के केंद्र में रखा गया। क्योंकि पानी की सबसे बड़ी उपयोगकर्ता और जल संकट की सबसे बड़ी पीड़ित वही थीं। उनकी सक्रिय सहभागिता ने जल संरक्षण के प्रयासों को व्यवहारिक, टिकाऊ और समुदाय-आधारित बनाया। आज बालिकुमा केवल एक गांव नहीं, बल्कि इस बात का जीवंत उदाहरण है कि जब समुदाय जल को साझा संसाधन मानकर उसका संरक्षण और न्यायपूर्ण उपयोग करता है, तो केवल जल संकट ही दूर नहीं होता, बल्कि आजीविका, सामाजिक समानता, महिला सशक्तिकरण और सामुदायिक एकजुटता—सभी को नई दिशा मिलती है। बदलती जलवायु के दौर में बालिकुमा का यह मॉडल पूरे देश के लिए प्रेरणा का स्रोत है।