श्रवण कुमार अब भी हैं... बस उनका स्वरूप बदल गया है शाम के लगभग छह बजे होंगे। वृद्धाश्रम के बरामदे में बैठे कुछ चेहरे रोज़ की तरह सड़क की ओर देख रहे थे। शायद किसी के आने की उम्मीद में, शायद किसी अपने की आहट सुनने के लिए। उन्हीं में से एक वृद्ध ने मुस्कराने की कोशिश करते हुए कहा, "बेटा बहुत बड़ा अफसर है... बहुत व्यस्त रहता है। समय मिलते ही आएगा।" यह वाक्य जितना सरल लगता है, उतना ही गहरा है। इसमें एक पिता का गर्व भी छिपा है और एक ऐसी प्रतीक्षा भी, जिसकी कोई निश्चित तिथि नहीं होती। पिछले कुछ वर्षों में वृद्धाश्रमों की कहानियाँ समाज की संवेदनाओं का एक बड़ा विषय बन गई हैं। अखबारों, टेलीविजन और सोशल मीडिया पर अक्सर ऐसी खबरें दिखाई देती हैं जिनमें बुजुर्गों की उपेक्षा, अकेलापन और टूटते पारिवारिक रिश्तों की चर्चा होती है। इन खबरों को देखकर कई बार ऐसा लगता है जैसे पूरी नई पीढ़ी अपने माता-पिता को भूल चुकी है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? शायद नहीं। सच्चाई का एक दूसरा चेहरा भी है। वह इतना शांत है कि अक्सर समाचार नहीं बनता। उसमें कोई सनसनी नहीं है, कोई विवाद नहीं है, केवल जिम्मेदारी, प्रेम और मौन समर्पण है। दिल्ली में नौकरी करने वाली एक बेटी हर रात सोने से पहले लखनऊ में रहने वाली अपनी माँ को वीडियो कॉल करती है। बातचीत केवल पाँच या दस मिनट की होती है, लेकिन माँ के लिए वही दिन का सबसे सुखद समय होता है। बेंगलुरु में कार्यरत एक युवा इंजीनियर हर महीने अपने पिता की दवाइयों की सूची डॉक्टर से साझा करता है, अस्पताल की नियुक्तियाँ ऑनलाइन तय करता है और पड़ोस में रहने वाले मित्र से आग्रह करता है कि सप्ताह में एक-दो बार उनके घर अवश्य हो आए। अमेरिका में रहने वाला एक बेटा भारत में अपने माता-पिता के घर में सुरक्षा कैमरे, आपातकालीन अलार्म और नियमित स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था कर चुका है। वह हजारों किलोमीटर दूर है, लेकिन माता-पिता की धड़कनों से जुड़ा हुआ है। ये कहानियाँ शायद कभी सुर्खियाँ नहीं बनेंगी, लेकिन यही हमारे समय की सबसे सुंदर कहानियाँ हैं। हम अक्सर श्रवण कुमार का उदाहरण देते हैं। उन्होंने अपने माता-पिता को कंधों पर बैठाकर तीर्थयात्रा कराई थी। वह उस युग की सबसे बड़ी सेवा थी। आज का समय अलग है। आज का श्रवण कुमार अपने माता-पिता को कंधों पर नहीं, बल्कि अपने दायित्वों, तकनीक और संवेदनाओं के सहारे जीवन की कठिन यात्राओं में साथ लेकर चलता है। उसके हाथ में काँवर नहीं, मोबाइल फोन है। वह जंगलों से नहीं गुजरता, बल्कि ट्रैफिक, बैठकों, समय-सीमाओं और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच अपना रास्ता बनाता है। लेकिन दिन कितना भी व्यस्त क्यों न हो, उसके मन में एक कोना हमेशा माता-पिता के लिए सुरक्षित रहता है। निस्संदेह, यह भी सच है कि बढ़ती उम्र में माता-पिता को केवल आर्थिक सहायता नहीं चाहिए। उन्हें किसी का स्पर्श चाहिए, साथ बैठकर चाय पीने वाला कोई अपना चाहिए, त्योहारों की रौनक चाहिए, घर में बच्चों की आवाज़ चाहिए। इन भावनात्मक आवश्यकताओं का कोई विकल्प नहीं हो सकता। लेकिन हर दूरी को संवेदनहीनता मान लेना भी उचित नहीं है। कई बार जीवन की परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं कि साथ रहना संभव नहीं होता। नौकरी, बच्चों की पढ़ाई, जीवनसाथी का कार्यक्षेत्र, स्वास्थ्य सुविधाएँ और आर्थिक आवश्यकताएँ परिवारों को अलग-अलग शहरों में रहने के लिए विवश कर देती हैं। ऐसे में प्रेम की कसौटी केवल साथ रहने से नहीं, बल्कि निभाने से तय होती है। दरअसल, रिश्ते समय की मात्रा से नहीं, संवेदनाओं की गुणवत्ता से मजबूत होते हैं। कोई व्यक्ति दिनभर घर में रहकर भी माता-पिता से दूर हो सकता है और कोई हजारों किलोमीटर दूर रहकर भी हर क्षण उनके साथ खड़ा हो सकता है। आज समाज को आवश्यकता है कि वह केवल नकारात्मक उदाहरणों को ही न दोहराए। हमें उन बेटों और बेटियों की भी चर्चा करनी चाहिए जो अपने संघर्षों के बीच माता-पिता की गरिमा और सम्मान को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं। वे छुट्टियाँ बचाकर माँ के ऑपरेशन के समय घर पहुँचते हैं। वे पिता के जन्मदिन पर केवल उपहार नहीं भेजते, बल्कि पूरे परिवार को जोड़ने का अवसर बनाते हैं। वे यह सुनिश्चित करते हैं कि माता-पिता कभी यह महसूस न करें कि वे अकेले हैं। शायद आधुनिक जीवन का सबसे बड़ा संकट समय की कमी नहीं, बल्कि संवाद की कमी है। यदि दिन में कुछ मिनट भी पूरे मन से अपने माता-पिता के लिए निकाले जाएँ, यदि उनकी बात धैर्य से सुनी जाए, यदि उन्हें यह एहसास दिलाया जाए कि वे आज भी परिवार के केंद्र में हैं, तो दूरी का दर्द काफी हद तक कम हो सकता है। आज आवश्यकता केवल अच्छे बेटे या अच्छी बेटी बनने की नहीं है, बल्कि अच्छे इंसान बने रहने की है। माता-पिता ने हमारे बचपन की हर छोटी-बड़ी आवश्यकता को बिना घड़ी देखे पूरा किया था। अब जब उनकी चाल धीमी हो गई है, उनकी आँखों की रोशनी कम हो गई है और उनके कदम सहारे की तलाश करते हैं, तब हमारा दायित्व केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि कृतज्ञता भी है। हर वृद्धाश्रम की कहानी उपेक्षा की कहानी नहीं होती और हर दूर रहने वाला बेटा या बेटी असंवेदनशील नहीं होता। इस बदलते समय में श्रवण कुमार अब भी हैं। वे हमारे आसपास ही हैं। बस उनके कंधों पर अब काँवर नहीं, जिम्मेदारियों का भार है; उनके हाथों में तीर्थयात्रा की लाठी नहीं, मोबाइल फोन है; और उनके हृदय में आज भी वही अटूट श्रद्धा है, जिसने सदियों पहले एक पुत्र को अमर बना दिया था। शायद अब समय आ गया है कि हम आधुनिक श्रवण कुमारों को पहचानें, उनका सम्मान करें और यह स्वीकार करें कि बदलती दुनिया में भी रिश्तों की सबसे मजबूत डोर आज भी प्रेम, सम्मान और उत्तरदायित्व ही है...