लखनऊ की झीलों की बात हो, तो अकसर शहर के बीच स्थित कठौता, बटलर और मोती झील का नाम लिया जाता है। इसके अलावा शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर मोहनलाल गंज की करैला झील के बारे में कम ही लोग जानते हैं। यह झील सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़े Archaelogical Site हुलास खेड़ा से सटी हुई है लेकिन झील का आकार बीते डेढ़ दशकों में 207 हेक्टेयर से सिमट कर महज़ 9.39 हेक्टेयर रह गया है। पिछले पांच दशकों में करेला झील के क्षेत्र में 90% तक की कमी आई है। विशेषज्ञों की माने तो अगर इस इस झील का संरक्षण किया जाए तो यह लखनऊ के दक्षिणी भाग के लिए भविष्य में एक महत्वपूर्ण जल भंडार बन सकता है। मोहनलाल गंज क्षेत्र में कई झीलें थीं। पर, शहर के अन्य हिस्सों की तरह अनियंत्रित विकास, अतिक्रमण और अंधाधुंध भूजल दोहन के कारण ये झीलें सिकुड़ गईं या खत्म हो गईं। करेला झील भी खत्म होने की कगार पर पहुंच चुकी है। हालांकि, यदि इसे बचाने के उपाय किए जाएं, तो यह बाढ़ के पानी और सूखे के दौरान जल स्रोतों को भरने का एक अच्छा स्रोत बन सकती है। मानवीय गतिविधियों के कारण यह झील न दिन पर दिन सिकुड़ती जा रही है बल्कि इसका पारिस्थितिक तंत्र भी सिमटता जा रहा है। हाल ही में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोबोटनी (बीएसआईपी) और लखनऊ की बाबासाहब भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी (BBAU) के पर्यावरण वैज्ञानिकों ने हुए एक शोध में यह निष्कर्ष निकाला है कि यदि हुलास खेड़ा की करेला झील का सही ढंग से संरक्षण किया जाए, तो जलापूर्ति के लिए यह दक्षिणी लखनऊ क्षेत्र के लिए जीवन रेखा बन सकती है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि तेजी से बढ़ती आबादी और भूजल दोहन के कारण लखनऊ के कई हिस्सों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। ऐसे में करैला जैसी बड़ी प्राकृतिक झीलें भविष्य की जल सुरक्षा के लिए रणनीतिक महत्व रखती हैं। जल विशेषज्ञों का कहना है कि यदि झील से अतिक्रमण हटाकर उसकी मूल जलग्रहण क्षमता बहाल की जाए, कचरा निकाला जाए और वर्षा जल को व्यवस्थित तरीके से इसमें पहुंचाया जाए, तो यह लाखों लीटर अतिरिक्त पानी संग्रहित कर सकती है। इससे न केवल भूजल रिचार्ज बढ़ेगा बल्कि दक्षिणी लखनऊ में पेयजल आपूर्ति पर पड़ने वाला दबाव भी काफी हद तक कम किया जा सकता है। यह झील सई नदी की धारा का हिस्सा थी, जो बाद में नदी का दायरा सिमटने के कारण उससे अलग हो गई। इसका क्षेत्रफल पहले काफी बड़ा था, लेकिन समय के साथ घट गया। शोधकर्ताओं ने इन दीर्घकालिक परिवर्तनों का सटीक मानचित्रण उपग्रह डेटा का उपयोग कर के किया है । इस अध्ययन से यह भी पता चला है कि इस क्रमिक परिवर्तन ने झील के पारिस्थितिकी तंत्र को स्थायी रूप से नुकसान पहुंचाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अब भी करैला झील को अतिक्रमण और अवैध कब्जों से मुक्त कराकर इसका सही ढंग से संरक्षण किया जाए, तो यह दक्षिण लखनऊ के भूजल पुनर्भरण की जीवनरेखा बन सकती है।